बिहार में सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी जा चुकी है और अब केवल औपचारिक घोषणा बाकी है. सीएम नीतीश कुमार मंगलवार को अपनी आखिरी कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता करेंगे और इसके बाद राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप सकते हैं. इसके साथ ही बिहार की राजनीति में लंबे समय से चला आ रहा ‘नीतीश युग’ समाप्त होने के साथ बिहार में राजनीतिक दशा और दिशा भी पूरी तरह बदल जाएगी.
बिहार की राजनीति में पिछले दो दशक से नीतीश कुमार सत्ता के धुरी बने थे और उनके इर्द-गिर्द ही पूरी सियासत सिमटी रही. बीजेपी बैकडोर पर थी, लेकिन अब सत्ता की स्टेरिंग उसके हाथ में होगी. बिहार के इतिहास में बीजेपी पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने जा रही है, जो नया राजनीतिक अध्याय है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पटना से दिल्ली प्रस्थान करने के साथ ही बिहार की सियासत में एक ‘न्यू पॉलिटिक्ल अलाइनमेंट’ मतलब नया राजनीतिक समीकरण बन सकता है, जिसके सियासी बिसात से जेडीयू ओझल हो सकती है.ऐसे में अब सियासी मुकाबला त्रिकोणीय नहीं, बल्कि सीधे तौर पर बीजेपी बनाम आरजेडी का हो सकता है?
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बिहार में ‘नीतीश युग’ का क्या अंत है
नीतीश कुमार अपने राजनीतिक सफर का आगाज आपातकाल के दौर में शुरू किया, लेकिन चुनावी सफलता 1985 के चुनाव में मिली. 1985 में पहली बार विधायक बने और चार साल के बाद 1989 से सांसद बन गए. नीतीश कुमार को सियासी बुलंदी 2005 में मिली, जब मुख्यमंत्री बने. इसके बाद से बिहार की राजनीति के नीतीश कुमार बेताज बादशाह बन गए, उनके इर्द-गिर्द पूरी सियासत सिमटी रही. बिहार की राजनीति को अपने हिसाब से तय करते आ रहे, लेकिन अब फिर से ऐतिहासिक मोड़ पर आ खड़ी हुई है.
2025बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को प्रचंड जीत मिली तो नीतीश कुमार 10वीं बार बिहार के मुख्य बने,लेकिन अब चार महीने के बाद सीएम पद से मोहभंग हो गया है और फिर से सांसदी करने के लिए राज्यसभा का रास्ता अपनाया है. नीतीश कुमार ने जहां से आकर बिहार की सत्ता अपने हाथ में ली थी और अब फिर से वहीं लौटने का फैसला किया है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का 10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद लगभग तय हो गया है कि बिहार में दो दशकों से चला आ रहा ‘सुशासन बाबू’ का युग समाप्त होने की दिशा में है. नीतीश का दिल्ली जाना केवल एक नेता का सियासी पलायन नहीं है, बल्कि बिहार की उस राजनीति का अंत है, जहां एक क्षेत्रीय दल बड़े दलों की सियासत को अपने तरह से तय करता रहा है.
बिहार में ‘न्यू पॉलिटिक्ल अलाइनमेंट’
नीतीश कुमार के चलते बिहार की राजनीति अभी तक त्रिकोणीय रही है, जो बीजेपी, आरजेडी और जेडीयू के बीच बंटी हुई थी. नीतीश कुमार 20 सालों से बिहार की राजनीतिक दशा अपने मुताबिक तय करते रहे हैं. उन्होंने कभी भाजपा तो कभी आरजेडी के साथ हाथ मिलाकर बिहार के सत्ता की चाबी अपने पास रखी, लेकिन अब जब नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और दिल्ली की राजनीति में सक्रिय होने के फैसले किया है तो बिहार की राजनीति समीकरण भी बदल सकता है और ‘न्यू पॉलिटिक्ल अलाइनमेंट’ बनेगा.
बिहार में सत्ता की बागडोर बीजेपी के हाथों में आने से राजनीति के केंद्र में वही होगी. बीजेपी अब बिहार में छोटे भाई यानि ‘जूनियर पार्टनर’ की भूमिका से बाहर निकलकर अब बड़े भाई के रोल में होगी. इसके चलते सियासी बिसात से ‘तीसरे कोण’ यानी जेडीयू ओझल हो सकती है. बिहार की सियासत में बीजेपी नया बॉस बनने जा रही है तो नीतीश कुमार के सीन से हटते ही विपक्षी खेमे में तेजस्वी यादव सबसे बड़े नेता के रूप में उभर सकते हैं.
बिहार की राजनीति में वाकई एक युगांतकारी बदलाव की दिशा में बढ़ रही है. नीतीश कुमार के सीएम रहते बिहार की सियासत जेडीयू बनाम आरजेडी होती रही, लेकिन अब उनके दिल्ली से जाने से जेडीयू की जगह बीजेपी ले सकती है. इस तरह बिहार में नया राजनीतिक समीकरण बन सकता है. नीतीश के बिना जेडीयू का आधार दरक सकता है, जिस पर नजर बीजेपी और आरजेडी दोनों की होगी?
बीजेपी बनाम आरजेडी का मुकाबला
नीतीश कुमार भले ही दो दशकों से बिहार की राजनीति के ‘धुरी’ बने रहे हों, लेकिन उनके हटते ही सियासी मुकाबला सीधा द्विध्रुवीय हो जाएगा. बिहार में ‘बड़े भाई’ से सियासी ‘बॉस’ तक का सफर अब तक बीजेपी बिहार में नीतीश कुमार के पीछे रहकर राजनीति करती थी, लेकिन अब सीन बदल चुका है. जेडीयू बनाम आरजेडी की चली आ रही जंग बीजेपी बनाम आरजेडी में तब्दील हो सकती है. आरजेडी के निशाने पर पूरी तरह से बीजेपी होगी और बीजेपी के टारगेट पर आरजेडी.
सीएम नीतीश कुमार के दिल्ली जाते ही जेडीयू के भीतर ‘अस्तित्व का संकट’ गहरा सकता है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जेडीयू का अपना कोई स्वतंत्र कैडर वोट बैंक नहीं है, बल्कि वह नीतीश के चेहरे पर टिका था. भाजपा की कोशिश है कि नीतीश के लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) और अति पिछड़ा (EBC) वोट बैंक को अपने पाले में कर लिया जाए तो तेजस्वी की नजर भी इसी वोटबैंक पर है. आरजेडी ने यह प्रचार कर रही है कि बीजेपी ने नीतीश कुमार को जबरन किनारे लगाने का काम किया है.
हिंदुत्व बनाम सामाजिक न्याय की जंग
बिहार में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है. नीतीश कुमार के रहते हुए बीजेपी खुलकर हिंदुत्व का दांव नहीं खेल पाती थी, लेकिन अब जब सत्ता की पूरी कमान उसके हाथ में होगी तो विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सियासी हथियार बनाने का काम करेगी. ऐसे बीजेपी आक्रामक तरीके से हिंदुत्व के एजेंडे को अमलीजामा पहनाने का काम करेगी तो जवाब में आरजेडी सामाजिक न्याय के एजेंडे को खुलकर धार देते नजर आएंगे.
नीतीश के हटते ही तेजस्वी यादव अब बिहार में विपक्ष का एकलौता सबसे बड़ा चेहरा बन गए हैं. बेरोजगारी के साथ जातिगत जनगणना के आंकड़े और विशेष राज्य का दर्जा की मांग लेकर सियासी माहौल बनाने की कोशिश करेंगे. इस तरह से तेजस्वी दलित और ईबीसी वोटों को साधने की दांव भी चल सकते हैं. इस तरह बिहार अब द्विध्रुवीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है, जहां एक तरफ केंद्र की सत्ता का रसूख और मोदी का मैजिक होगा, तो दूसरी तरफ तेजस्वी के लिए अब रास्ता साफ हो गया है.
तेजस्वी यादव को अब नीतीश कुमार के ‘U-टर्न’ की चिंता नहीं करनी होगी. अब उनकी लड़ाई सीधे तौर पर भाजपा की ‘डबल इंजन’ सरकार और हिंदुत्व के एजेंडे से है. ऐसे में तेजस्वी यादव अपने ‘यूथ अपील’ और सामाजिक न्याय की जंग के बहाने राजनीतिक वापसी की जुगत करेंगे. बिहार अब यूपी की राह पर खड़ी. जैसे उत्तर प्रदेश में मायावती के कमजोर पड़ने के बाद लड़ाई ‘बीजेपी बनाम सपा’ हो गई, वैसे ही बिहार में नीतीश के कमजोर पड़ने पर अब मुकाबला ‘बीजेपी बनाम आरजेडी’ की होगी.
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